बांग्लादेश में 'रहमान राज': 20 साल बाद BNP की प्रचंड जीत; 35 साल बाद पुरुष PM संभालेंगे देश की कमान

BNP अध्यक्ष तारिक रहमान वोट डालते हुए। रहमान पीएम पद के सबसे बड़े दावेदार हैं।.
ढाका: पड़ोसी देश बांग्लादेश से बड़ी खबर आ रही है। गुरुवार को हुए आम चुनाव के नतीजों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। तारिक रहमान की अगुवाई वाली BNP ने 299 में से 209 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है। यह जीत न केवल BNP की वापसी है, बल्कि शेख हसीना के 15 साल पुराने शासन के अंत पर जनता की आखिरी मुहर भी है।
1. 35 साल बाद टूटेगा रिकॉर्ड: तारिक रहमान का PM बनना तय
बांग्लादेश के इतिहास में 1991 से लेकर 2024 तक केवल दो महिलाएं—शेख हसीना और खालिदा जिया ही प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज रहीं।
पुरुष प्रधानमंत्री: आखिरी बार 1988 में काजी जफर अहमद प्रधानमंत्री बने थे। अब 35 साल बाद तारिक रहमान इस परंपरा को तोड़ेंगे।
शानदार वापसी: भ्रष्टाचार के आरोपों में 17 साल देश से बाहर रहे तारिक रहमान ने दो सीटों से चुनाव लड़ा और दोनों पर जीत हासिल की। उनकी मां खालिदा जिया के निधन के बाद उन्होंने जिस तरह से पार्टी को संभाला, उसका नतीजा आज सबके सामने है।
2. चुनाव के मुख्य आंकड़े और गठबंधन की ताकत
BNP की ताकत: 299 में से 209 सीटें जीतकर पार्टी ने 150 के जादुई आंकड़े को आसानी से पार कर लिया।
सहयोगी दल: जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन को 70 सीटें मिली हैं। जमात प्रमुख शफीकुर रहमान ने ढाका-15 से जीत दर्ज की है।
हार का स्वाद: जमात के इकलौते हिंदू उम्मीदवार कृष्णा नंदी को हार का सामना करना पड़ा है।
3. हिंसा की आंच और धांधली के आरोप
जीत का जश्न हिंसा की खबरों के बीच मना। वोटिंग के दौरान खुलना में एक BNP नेता की मौत हो गई और कई जगहों पर देसी बम फेंके गए।
शेख हसीना का कड़ा रुख: भारत में रह रही शेख हसीना ने इस चुनाव को “दिखावटी और फिक्स” करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी पार्टी ‘आवामी लीग’ को बाहर रखकर जनता के साथ धोखा किया गया है।
NCP का आरोप: नाहिद इस्लाम की नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) ने भी देर रात प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नतीजों में गड़बड़ी की साजिश का आरोप लगाया है।
4. भारत के लिए क्या बदलेगा?
भारत सरकार फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि अंतिम जनादेश के बाद ही रिश्तों की नई दिशा तय होगी। हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि तारिक रहमान के साथ रिश्तों को ‘रीसेट’ करने का यह एक अच्छा मौका हो सकता है।
BNP के वो 3 वादे जिन पर जनता ने जताया भरोसा:
महिला सशक्तिकरण: पोस्ट ग्रेजुएशन तक मुफ्त पढ़ाई और ‘फैमिली कार्ड’।
बुलेट ट्रेन: ढाका को बड़े शहरों से जोड़ने के लिए हाई-स्पीड रेल का वादा।
अल्पसंख्यक सुरक्षा: हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के लिए सख्त सुरक्षा कानून।
निष्कर्ष: बांग्लादेश में अब एक नए युग की शुरुआत हो रही है। तारिक रहमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और भारत जैसे पड़ोसियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की होगी।
हरियाणा में 'महा-हड़ताल':हरियाणा में 10 ट्रेड यूनियनों का महा-आंदोलन; दमनकारी सरकारी पहरों के बीच कर्मचारी सड़कों पर

चंडीगढ़/हरियाणा: अपनी जायज मांगों और बुनियादी अधिकारों के लिए हरियाणा के लाखों कर्मचारी आज सरकार की ‘सख्ती’ और ‘बंदिशों’ के खिलाफ लामबंद हैं। पुरानी पेंशन (OPS) की बहाली और कच्चे कर्मचारियों को पक्का करने जैसी बुनियादी मांगों को लेकर 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने आज प्रदेशव्यापी चक्का जाम और हड़ताल का बिगुल फूंका है। सरकार ने इस आवाज को दबाने के लिए ‘धारा 163’ और ‘वेतन कटौती’ जैसे हथियारों का सहारा लिया है, लेकिन कर्मचारियों का हौसला डगमगाया नहीं है।
1. मांगों की अनदेखी: आखिर क्यों हड़ताल पर है मजदूर-कर्मचारी?
कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह हड़ताल शौक नहीं, मजबूरी है। उनकी मुख्य मांगें पूरी तरह तर्कसंगत हैं:
पुरानी पेंशन (OPS) की बहाली: रिटायरमेंट के बाद सामाजिक सुरक्षा की मांग कर रहे लाखों कर्मचारियों की सुनवाई नहीं हो रही है।
कच्चे कर्मचारियों का हक: वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे कर्मचारियों को ‘समान काम-समान वेतन’ और नियमित नौकरी से वंचित रखा गया है।
लेबर कोड में बदलाव का विरोध: कर्मचारियों का आरोप है कि नए श्रम नियम केवल कॉर्पोरेट घरानों के फायदे के लिए हैं, जिससे मजदूरों के अधिकार खत्म हो जाएंगे।
मिड-डे मील वर्करों की पीड़ा: मामूली मानदेय पर काम करने वाली 28 हजार महिलाएं अपने सम्मानजनक वेतन के लिए लड़ रही हैं।
2. सरकार का ‘दमनकारी’ रुख: सेवा के नाम पर सख्ती
आंदोलन को विफल करने के लिए सरकार ने लोकतांत्रिक विरोध को कुचलने की कोशिश की है:
धारा 163 का घेरा: बस अड्डों और दफ्तरों को छावनी में तब्दील कर दिया गया है ताकि कर्मचारी अपनी आवाज न उठा सकें।
No Work-No Wage की धमकी: बिजली विभाग सहित कई विभागों में वेतन काटने के आदेश जारी कर कर्मचारियों को डराने की कोशिश की गई है।
छुट्टियों पर पाबंदी: आपातकालीन स्थिति को छोड़कर सभी जायज छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं, जिसे कर्मचारी संगठन बुनियादी मानवाधिकारों का हनन बता रहे हैं।
3. ‘जत्थों’ की गूंज और जनसमर्थन
पिछले 10 दिनों से हरियाणा के 23 जिलों में कर्मचारी नेताओं ने जनता के बीच जाकर अपनी बात रखी है। सीटू (CITU), सर्व कर्मचारी संघ और बैंक-बीमा फेडरेशन जैसे संगठनों का दावा है कि सरकार केवल आंकड़ों और बल के दम पर सेवाएं सुचारू दिखाने की कोशिश कर रही है, जबकि जमीनी स्तर पर कर्मचारियों में भारी रोष है।
कर्मचारी नेताओं का तर्क: “अगर सरकार बातचीत के जरिए हमारी जायज मांगें मान लेती, तो आज न बच्चों का खाना रुकता और न जनता को परेशानी होती। यह गतिरोध सरकार की हठधर्मिता का नतीजा है।”
1. सरकार के ‘सख्त’ इंतजाम: आंदोलन रोकने की घेराबंदी
सरकार ने कर्मचारियों को रोकने के लिए साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाई है:
बस अड्डों पर ‘किलाबंदी’: प्रदेश के प्रमुख बस अड्डों के आसपास धारा 163 (निषेधाज्ञा) लागू कर दी गई है। 5 या उससे ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी है। भारी पुलिस बल तैनात है ताकि रोडवेज कर्मी बसों को बाहर निकालने से न रोक सकें।
बिजली विभाग में ‘हंटर’: बिजली निगम ने ‘No Work-No Wage’ (काम नहीं तो वेतन नहीं) का फरमान जारी किया है। किसी भी कर्मचारी की छुट्टी मंजूर नहीं की गई है। अगर कहीं भी बिजली कटती है, तो उसे ‘तोड़फोड़’ मानकर तुरंत गिरफ्तारी के आदेश हैं।
इंटेलिजेंस की नजर: खुफिया विभाग के अधिकारी सादी वर्दी में बस अड्डों, डिपो और बिजली घरों पर तैनात हैं, जो आंदोलनकारियों की हर हरकत की रिपोर्ट सीधे मुख्यालय भेज रहे हैं।
2. क्या खुला रहेगा? (जनता के लिए राहत)
सरकार का दावा है कि आवश्यक सेवाएं प्रभावित नहीं होंगी:
परिवहन: रोडवेज की कुछ बसों पर असर पड़ सकता है, लेकिन ‘किलोमीटर स्कीम’ की बसें और निजी सहकारी समितियों की बसें पूरी तरह चल रही हैं। प्राइवेट टैक्सियाँ और ऑटो भी चलते रहेंगे।
शिक्षा: सभी सरकारी और निजी स्कूल-कॉलेज खुले रहेंगे। परीक्षाओं की तारीखों में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
बाजार: अनाज मंडियां, पेट्रोल पंप, मुख्य बाजार और व्यापारिक प्रतिष्ठान खुले रहेंगे।
बैंकिंग: निजी सेक्टर के बैंक (जैसे HDFC, ICICI) खुले हैं। सरकारी बैंकों में काम धीमा हो सकता है, लेकिन ATM और ऑनलाइन ट्रांजेक्शन पर कोई असर नहीं है।
3. कहाँ पड़ेगा असर? (क्या रहेगा बंद)
मिड-डे मील: सरकारी स्कूलों में खाना बनाने वाली 28 हजार वर्करों के हड़ताल पर होने से बच्चों को दोपहर का भोजन मिलने में दिक्कत होगी।
सरकारी दफ्तर: ग्रुप-C और D के कर्मचारियों की बड़ी संख्या हड़ताल में शामिल है, जिससे नगर निगम, तहसील और अन्य प्रशासनिक दफ्तरों में कामकाज ठप रह सकता है।
सरकारी बैंक: SBI और अन्य सरकारी बैंकों की यूनियनों के समर्थन के कारण बैंक काउंटर पर लेन-देन और चेक क्लियरेंस प्रभावित हो सकता है।
निष्कर्ष
सरकार की रणनीति स्पष्ट है— सुविधाएं बहाल रखकर आंदोलन के असर को शून्य करना। दूसरी तरफ, कर्मचारी संगठनों का कहना है कि सरकार दमनकारी नीतियों से उनकी आवाज नहीं दबा सकती। आज शाम तक साफ हो जाएगा कि जीत ‘सरकारी सख्ती’ की होती है या ‘कर्मचारी एकता’ की।
संसद में 'महा-संग्राम': राहुल की मीटिंग के बाद गायब हुए स्पीकर ओम बिरला? विपक्ष लाया अविश्वास प्रस्ताव, क्या दांव पर है कुर्सी?

भारतीय लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद में इस वक्त अभूतपूर्व अनिश्चितता का माहौल है। एक तरफ विपक्ष ने स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ ‘अविश्वास प्रस्ताव’ (No-Confidence Motion) का नोटिस थमा दिया है, तो दूसरी तरफ राहुल गांधी के साथ एक अहम मीटिंग के बाद से स्पीकर सदन में नजर नहीं आए हैं। गलियारों में सवाल तैर रहा है— क्या स्पीकर की कुर्सी जाने वाली है?
1. राहुल गांधी से मुलाकात और ‘गायब’ होने का रहस्य
संसदीय सूत्रों के मुताबिक, विपक्ष के नेता राहुल गांधी और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात की थी। इस बैठक में विपक्षी सांसदों के निलंबन और सदन की कार्यवाही में निष्पक्षता को लेकर तीखी चर्चा हुई।
हैरानी की बात: इस मुलाकात के तुरंत बाद जब सदन की कार्यवाही फिर से शुरू हुई, तो स्पीकर अपनी कुर्सी पर नहीं थे। उनकी जगह पीठासीन अधिकारी (Panel Speaker) सदन चला रहे थे।
चर्चा: राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या स्पीकर ने नाराजगी में यह कदम उठाया है या फिर यह किसी बड़े रणनीतिक बदलाव का हिस्सा है।
2. अविश्वास प्रस्ताव: क्यों और कैसे?
विपक्ष ने संविधान के अनुच्छेद 94(c) के तहत स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव पेश किया है। विपक्ष का आरोप है कि:
स्पीकर सदन की कार्यवाही के दौरान विपक्षी सदस्यों को बोलने का पर्याप्त मौका नहीं दे रहे हैं।
सरकार के दबाव में आकर महत्वपूर्ण मुद्दों (जैसे नरवणे की किताब या चीन सीमा विवाद) पर चर्चा को रोका जा रहा है।
सांसदों का निलंबन ‘लोकतंत्र की हत्या’ के समान है।
3. क्या गिर जाएगी स्पीकर की कुर्सी? (गणित समझिए)
स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया इतनी आसान नहीं है:
14 दिन का नोटिस: प्रस्ताव पेश करने से 14 दिन पहले नोटिस देना अनिवार्य है।
बहुमत का खेल: स्पीकर को हटाने के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के ‘प्रभावी बहुमत’ (Effective Majority) की आवश्यकता होती है।
सत्तारूढ़ दल का पलड़ा: वर्तमान में एनडीए (NDA) के पास पर्याप्त आंकड़े हैं, जिससे इस प्रस्ताव के गिरने की संभावना अधिक है। लेकिन यह कदम सरकार और स्पीकर की साख पर एक बड़ा ‘नैतिक दबाव’ जरूर पैदा करता है।
4. आगे क्या होगा?
अगर यह प्रस्ताव चर्चा के लिए स्वीकार हो जाता है, तो चर्चा के दौरान स्पीकर खुद सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते। उन्हें एक सामान्य सदस्य की तरह वोट देने का अधिकार होगा, लेकिन बराबरी की स्थिति में वो ‘कास्टिंग वोट’ नहीं दे पाएंगे।
निष्कर्ष: संसद की यह लड़ाई अब सिर्फ नियमों तक सीमित नहीं है, यह सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच ‘अस्तित्व की जंग’ बन चुकी है। क्या ओम बिरला सोमवार को सदन लौटेंगे या यह टकराव और बढ़ेगा, इस पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं।
संसद से सीमा तक संग्राम: क्या PM ने सेना प्रमुख पर छोड़ा था युद्ध का फैसला? नरवणे की अनपब्लिश किताब से खुली 'सच्चाई'

“जो उचित समझो, वो करो!”— प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह एक जुमला उस रात भारत और चीन के बीच युद्ध की चिंगारी भड़का सकता था या उसे बुझा सकता था। पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ के कुछ अंशों ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। राहुल गांधी द्वारा संसद में इस किताब का मुद्दा उठाए जाने और पेंगुइन पब्लिशिंग के बयान ने इस विवाद को और गहरा कर दिया है।
1. वो भयानक रात: जब चीनी टैंकों के निशाने पर था लद्दाख
किताब के लीक हुए पन्नों के अनुसार, 31 अगस्त 2020 की रात भारतीय सेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी। चीनी टैंक पूर्वी लद्दाख में रेचिन ला की ओर बढ़ रहे थे।
दूरी सिर्फ 500 मीटर: चीनी टैंक भारतीय पोस्ट के इतने करीब आ गए थे कि उन्हें रोकने का एकमात्र रास्ता भारी गोलाबारी (Artillery Fire) शुरू करना था।
दिल्ली से ‘स्पष्ट निर्देश’ का इंतजार: जनरल नरवणे ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और NSA अजीत डोभाल को बार-बार फोन कर पूछा कि क्या कार्रवाई की जाए, लेकिन घंटों तक कोई स्पष्ट आदेश नहीं मिला।
2. प्रधानमंत्री का फैसला: जिम्मेदारी या पल्ला झाड़ना?
किताब का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा रात 10:30 बजे का है। जब रक्षा मंत्री ने पीएम मोदी से बात करने के बाद नरवणे को फोन किया, तो निर्देश केवल एक वाक्य का था— “जो उचित समझो, वो करो।” * नरवणे ने किताब में लिखा है कि यह पूरी तरह से एक सैन्य फैसला बन गया था। प्रधानमंत्री ने ब्रीफिंग ली, लेकिन अंतिम निर्णय की पूरी जिम्मेदारी सेना प्रमुख के कंधों पर डाल दी गई।
3. ‘अग्निवीर’ योजना पर भी उठाए सवाल
खबरों के मुताबिक, जनरल नरवणे ने अपनी इस किताब में न केवल चीन के साथ झड़प, बल्कि केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘अग्निवीर योजना’ का भी रिव्यू किया है। शायद यही कारण है कि रक्षा मंत्रालय ने पिछले एक साल से इस किताब के पब्लिकेशन को मंजूरी नहीं दी है।
4. राहुल गांधी का हमला और पेंगुइन की सफाई
राहुल गांधी ने संसद में इस किताब की कॉपी दिखाते हुए सरकार को घेरा। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार किताब के अस्तित्व को नकार रही है जबकि सच्चाई पन्नों पर दर्ज है। वहीं, पब्लिशिंग कंपनी ‘पेंगुइन’ ने कहा है कि उन्होंने कोई भी हिस्सा सार्वजनिक नहीं किया है और लीक हुई पीडीएफ कॉपियों की जांच दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल कर रही है।
मुख्य बिंदु: देश की सुरक्षा और जिम्मेदारी
क्या संकट के समय सरकार ने सेना को स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए थे?
क्या ‘अग्निवीर’ पर जनरल नरवणे की राय सरकार के लिए असहज करने वाली है?
किताब को एक साल से क्यों रोका गया है?
यह विवाद केवल एक किताब का नहीं है, बल्कि यह उस रात की ‘सच्चाई’ का है जब देश युद्ध की कगार पर खड़ा था।
महाशक्ति की मुहर: अमेरिका ने मैप में PoK और अक्साई चिन को दिखाया भारत का हिस्सा, चीन-पाक को कड़ा संदेश

भारत और अमेरिका के बीच हुए ऐतिहासिक व्यापार समझौते के बीच एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने भारत के साथ अंतरिम व्यापार समझौते (ITA) का फ्रेमवर्क जारी करते समय भारत का जो नक्शा साझा किया है, उसमें पूरे जम्मू-कश्मीर (PoK सहित) और अक्साई चिन को भारत के अभिन्न अंग के रूप में दिखाया गया है।
1. कूटनीतिक गलियारों में हलचल: क्यों खास है यह मैप?
दशकों से अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश भारत के नक्शे में PoK और अक्साई चिन को ‘विवादित’ बताते हुए ‘डॉटेड लाइन्स’ या अलग रंग से दिखाते आए हैं। लेकिन इस बार ट्रंप प्रशासन द्वारा जारी किए गए मैप में किसी भी तरह की ‘डॉटेड लाइन’ नहीं है।
पाकिस्तान को झटका: पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ के ‘कश्मीर राग’ के तुरंत बाद अमेरिका का यह कदम पाकिस्तान के दावों को सिरे से खारिज करने जैसा है।
चीन को संदेश: 1962 से अक्साई चिन पर अवैध कब्जा जमाए बैठे चीन के लिए भी यह एक कड़ा कूटनीतिक संकेत है कि अमेरिका अब भारत की क्षेत्रीय अखंडता का खुला समर्थन कर रहा है।
2. ऐतिहासिक ट्रेड डील: भारतीय निर्यातकों की चांदी
नक्शे के साथ-साथ इस व्यापार समझौते ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नए द्वार खोल दिए हैं:
टैक्स में भारी कटौती: अमेरिका ने भारतीय सामानों पर लगने वाले टैक्स को 50% से घटाकर मात्र 18% कर दिया है।
रूस-तेल विवाद सुलझा: रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर लगा 25% अतिरिक्त टैक्स हटा लिया गया है, जो भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की जीत है।
जीरो टैरिफ का लाभ: जेनेरिक दवाएं, हीरे-जेवरात और विमान के पुर्जों पर अब अमेरिका में कोई टैक्स नहीं लगेगा।
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का बयान: “यह समझौता भारतीय निर्यातकों के लिए 27 लाख करोड़ रुपये से अधिक का बाजार खोलेगा। इससे MSME, किसानों और युवाओं के लिए रोजगार के लाखों नए अवसर पैदा होंगे।”
3. ‘500 अरब डॉलर’ का संकल्प
इस समझौते के तहत भारत ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर के उत्पाद खरीदने पर सहमति जताई है। यह न केवल दोनों देशों के बीच व्यापार घाटे को कम करेगा, बल्कि सप्लाई चेन को चीन से हटाकर भारत की ओर मोड़ने में मदद करेगा।
निष्कर्ष
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा यह मैप सिर्फ एक तस्वीर नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था का प्रमाण है। जहाँ एक ओर भारत को आर्थिक लाभ मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर सामरिक रूप से अमेरिका ने भारत की सीमाओं को पूर्ण मान्यता देकर नई दिल्ली के साथ अपनी ‘दोस्ती’ को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है।
पीएम मोदी के दावों की पड़ताल: नेहरू-गांधी परिवार और सरनेम विवाद के पीछे का ऐतिहासिक सच

5 फरवरी को राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार पर तीखे प्रहार किए। उन्होंने नेहरू-इंदिरा की नीतियों से लेकर ‘गांधी’ सरनेम तक पर सवाल उठाए। लेकिन जब इन दावों को इतिहास के पन्नों और दस्तावेजों की कसौटी पर परखा गया, तो कई चौंकाने वाली सच्चाइयां सामने आईं।
1. क्या नेहरू-इंदिरा देशवासियों को ‘समस्या’ मानते थे?
दावा: पीएम मोदी ने कहा कि नेहरू और इंदिरा गांधी जनता को ही अपनी समस्या मानते थे। उन्होंने उदाहरण दिया कि इंदिरा गांधी ने ईरान में कहा था कि उनके पिता के लिए 35 करोड़ लोग 35 करोड़ समस्याएं थे।
सच्चाई: इतिहास के दस्तावेज बताते हैं कि जवाहरलाल नेहरू ने 1957 में कोलकाता में एक पत्रकार के सवाल पर कहा था कि “मेरे सामने 36 करोड़ समस्याएं हैं, क्योंकि देश का हर नागरिक एक जिम्मेदारी है।” नेहरू का आशय जनता को समस्या बताना नहीं, बल्कि हर नागरिक के कल्याण को अपनी प्राथमिकता और चुनौती बताना था। वहीं, इंदिरा गांधी के ईरान दौरे (1974) के रिकॉर्ड में ऐसा कोई भाषण नहीं मिलता जहां उन्होंने जनता को ‘समस्या’ कहा हो।
2. ‘गांधी’ सरनेम: क्या यह वाकई ‘चुराया’ गया है?
दावा: पीएम ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के इस परिवार ने महात्मा गांधी का सरनेम ‘चुरा’ लिया है।
सच्चाई: तथ्यों के अनुसार, जवाहरलाल नेहरू की पुत्री इंदिरा का विवाह 1942 में फिरोज गांधी से हुआ था। फिरोज का जन्म एक पारसी परिवार में हुआ था और उनका सरनेम पहले ‘घांडी’ (Ghandy) था। महात्मा गांधी से प्रभावित होकर उन्होंने इसे बदलकर ‘गांधी’ (Gandhi) कर लिया था। भारतीय परंपरा के अनुसार, शादी के बाद इंदिरा ने अपने पति का सरनेम अपनाया। फिरोज और महात्मा गांधी के बीच कोई पारिवारिक रिश्ता नहीं था, लेकिन यह सरनेम वैवाहिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत परिवार का हिस्सा बना, न कि किसी ‘चोरी’ के जरिए।
3. ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी’ के नारों का सच
दावा: पीएम ने कहा कि ‘मोहब्बत की दुकान’ चलाने वाले उनकी कब्र खोदने के नारे लगा रहे हैं।
सच्चाई: यह नारा पहली बार फरवरी 2023 में पवन खेड़ा की गिरफ्तारी के समय कुछ कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने लगाया था। हाल ही में JNU में भी ऐसे नारे लगे, लेकिन उनका कांग्रेस पार्टी से कोई आधिकारिक लिंक नहीं मिला। राहुल गांधी ने ‘मोहब्बत की दुकान’ का नारा बीजेपी की विचारधारा के विरोध में दिया था, जबकि ‘कब्र’ वाले विवादित नारे कार्यकर्ताओं के व्यक्तिगत आक्रोश का हिस्सा थे।
4. सरदार सरोवर बांध: दशकों की देरी का जिम्मेदार कौन?
दावा: नेहरू ने नींव रखी और मोदी ने पूरा किया, कांग्रेस केवल कल्पना करती है।
सच्चाई: नींव नेहरू ने 1961 में जरूर रखी थी, लेकिन प्रोजेक्ट के लटकने का मुख्य कारण राज्यों के बीच जल विवाद और ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के कारण लगा कानूनी स्टे था। 1987 में राजीव गांधी सरकार के दौरान इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ और विश्व बैंक से फंडिंग मिली। 2000 में सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी मिलने के बाद काम ने गति पकड़ी। यह प्रोजेक्ट किसी एक सरकार नहीं बल्कि दशकों की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का परिणाम था।
निष्कर्ष: प्रधानमंत्री के भाषण में राजनीतिक तंज और ऐतिहासिक तथ्यों के बीच एक महीन रेखा है। जहाँ सरनेम का मुद्दा पारिवारिक इतिहास से जुड़ा है, वहीं ‘जनता को समस्या’ बताने वाला बयान नेहरू की ‘लोकतांत्रिक जिम्मेदारी’ वाले भाषण का एक अलग नजरिया पेश करता है।
विपक्ष का सनसनीखेज आरोप: "एपस्टीन फाइल्स में पीएम मोदी का नाम", कांग्रेस ने दागे सीधे सवाल

जेफ्री एपस्टीन के काले कारनामों की फाइल्स को लेकर भारतीय राजनीति में भूचाल आ गया है। कांग्रेस ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस विवाद के केंद्र में खड़ा करते हुए गंभीर कूटनीतिक और नैतिक सवाल पूछे हैं।

मोदी पर कांग्रेस के 3 तीखे वार:
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट के दस्तावेजों का हवाला देते हुए पीएम मोदी से जवाब मांगा है:
मुलाकात और सलाह: एपस्टीन ने अपनी फाइल्स में कथित तौर पर लिखा कि पीएम मोदी ने उसकी सलाह पर अमल किया। कांग्रेस पूछ रही है— एक अपराधी से कैसी सलाह ली जा रही थी?
ट्रम्प-इजराइल कनेक्शन: आरोप है कि मोदी ने इजराइल में डोनाल्ड ट्रम्प को फायदा पहुँचाने के लिए गतिविधियां कीं। विपक्ष इसे ‘राष्ट्रीय शर्म’ बता रहा है।
रहस्यमयी ‘IT WORKED’: फाइल्स में दर्ज इस वाक्य का असली मतलब क्या है, कांग्रेस ने इस पर स्पष्टीकरण मांगा है।
सरकार की दोटूक: “अपराधी की बातों का कोई वजूद नहीं”
विदेश मंत्रालय (MEA) ने एक आधिकारिक बयान जारी कर प्रधानमंत्री का नाम इस विवाद में घसीटने की कड़ी निंदा की है। सरकार का कहना है कि जेफ्री एपस्टीन एक सजायाफ्ता अपराधी था और उसके द्वारा लिखे गए किसी भी नाम या दावे की कोई कानूनी सत्यता नहीं है। यह भारत की वैश्विक छवि को धूमिल करने की एक नाकाम कोशिश है।
कौन था जेफ्री एपस्टीन?
जेफ्री एपस्टीन एक अमेरिकी फाइनेंसर था, जो 2019 में जेल में मृत पाया गया था। उस पर नाबालिग लड़कियों की तस्करी और यौन शोषण के गंभीर आरोप थे। उसकी ‘क्लाइंट लिस्ट’ या फाइल्स में दुनिया के कई रसूखदार नेताओं (जैसे बिल क्लिंटन, प्रिंस एंड्रयू और डोनाल्ड ट्रम्प) के नाम सामने आ चुके हैं, जिसे लेकर अमेरिका में आज भी विवाद जारी है।
सच का समय न्यूज़ ओपिनियन
जब बात देश के प्रधानमंत्री की गरिमा की हो, तो आरोप बेहद गंभीर हो जाते हैं। कांग्रेस इसे ‘सच्चाई की लड़ाई’ बता रही है, वहीं सत्ता पक्ष इसे ‘विदेशी साजिश और ओछी राजनीति’ करार दे रहा है।
हमारा विश्लेषण: अंतरराष्ट्रीय फाइल्स में नाम आना और किसी अपराध में संलिप्त होना दो अलग बातें हैं। बिना किसी पुख्ता सबूत या अमेरिकी जांच एजेंसी की आधिकारिक पुष्टि के, ऐसे आरोपों पर राजनीति तेज होना स्वाभाविक है, लेकिन इसकी सच्चाई की तह तक जाना अभी बाकी है।
ऐतिहासिक ट्रेड डील: अमेरिका ने भारत पर टैरिफ 50% से घटाकर 18% किया

नई दिल्ली/वॉशिंगटन: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच हुई फोन पर बातचीत के बाद सोमवार को एक ऐतिहासिक व्यापार समझौता (Trade Deal) हुआ है। इस डील के तहत अमेरिका ने भारत से आने वाले सामानों पर लगने वाले भारी-भरकम टैरिफ को घटाकर अब तक के सबसे निचले स्तरों में से एक पर ला दिया है।
टैरिफ में भारी कटौती: क्या है पूरा गणित?
राष्ट्रपति ट्रम्प ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर इस डील की घोषणा करते हुए बताया कि भारत पर लगा टैरिफ 50% से घटकर अब 18% रह गया है।
पूरी बात: ट्रम्प ने पहले ‘जैसे को तैसा’ नीति के तहत 25% टैरिफ लगाया था और रूस से तेल खरीदने के कारण 25% अतिरिक्त पेनल्टी लगाई थी। अब रूसी तेल पर लगा यह 25% पेनल्टी टैरिफ पूरी तरह हटा दिया गया है।
रूस नहीं, अब अमेरिका और वेनेजुएला से आएगा तेल
इस डील की सबसे बड़ी शर्त ऊर्जा सप्लाई को लेकर है:
रूसी तेल पर रोक: पीएम मोदी रूस से कच्चे तेल की खरीद बंद करने पर राजी हो गए हैं।
नए विकल्प: भारत अब अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अमेरिका से अधिक तेल खरीदेगा। साथ ही, वेनेजुएला से तेल खरीदने की संभावनाओं पर भी सहमति बनी है।
बाय अमेरिकन नीति: भारत ने प्रतिबद्धता जताई है कि वह अमेरिका से तकनीक, ऊर्जा, कृषि और कोयला जैसे क्षेत्रों में 500 अरब डॉलर (करीब 46 लाख करोड़ रुपये) से अधिक का सामान खरीदेगा।
पीएम मोदी ने जताया आभार: “अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर जाएगी पार्टनरशिप”
पीएम मोदी ने X (ट्विटर) पर राष्ट्रपति ट्रम्प का धन्यवाद करते हुए लिखा कि “मेड इन इंडिया” उत्पादों पर टैरिफ कम होना भारत के 1.4 अरब लोगों के लिए गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि दो बड़े लोकतंत्रों का साथ आना वैश्विक स्थिरता और समृद्धि के लिए शुभ संकेत है।
सच का समय न्यूज़ ओपिनियन
यह समझौता न केवल व्यापारिक है, बल्कि गहरे भू-राजनीतिक बदलाव का संकेत भी है। रूस से तेल की खरीद बंद करना भारत के लिए एक कठिन कूटनीतिक फैसला था, लेकिन बदले में मिली टैरिफ छूट और अमेरिकी तकनीक तक पहुँच भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बड़ा बूस्ट देगी।
हमारा विश्लेषण: ट्रम्प और मोदी की केमिस्ट्री एक बार फिर रंग लाई है। भारत अब उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जिन पर अमेरिका का टैरिफ सबसे कम है। हालांकि, रूस के साथ भारत के पुराने रिश्तों पर इसका क्या असर होगा, यह आने वाले समय में देखने वाली बात होगी।
बजट 2026: न टैक्स में राहत, न स्लैब में बदलाव; कैंसर की दवाएं सस्ती, 7 हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर और 3 आयुर्वेदिक AIIMS का ऐलान

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आज संसद में मोदी सरकार का 2026-27 का बजट पेश किया। 85 मिनट के भाषण में वित्त मंत्री ने मध्यम वर्ग को टैक्स स्लैब में कोई राहत नहीं दी, लेकिन स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे (Infrastructure) और महिला सशक्तिकरण के लिए कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। रक्षा बजट को भी बढ़ाकर ₹7.85 लाख करोड़ कर दिया गया है।
1. इनकम टैक्स: स्लैब यथावत, रिटर्न फाइलिंग में मिली मोहलत
टैक्स स्लैब में कोई बदलाव नहीं किया गया है, लेकिन प्रक्रिया को आसान बनाने पर जोर है:
रिवाइज्ड रिटर्न: अब छात्र और नौकरीपेशा लोग 31 दिसंबर के बजाय 31 मार्च तक अपना रिवाइज्ड रिटर्न फाइल कर सकेंगे (3 महीने की अतिरिक्त छूट)।
नया एक्ट: 1 अप्रैल 2026 से नया इनकम टैक्स एक्ट लागू होगा, जिसमें फॉर्म को बेहद सरल बनाया गया है।
राहत: मोटर एक्सीडेंट क्लेम की राशि को टैक्स फ्री कर दिया गया है। विदेश यात्रा पर टैक्स 5% से घटाकर 2% किया गया है।
2. हेल्थ सेक्टर: कैंसर का इलाज होगा सस्ता
बीमारियों से लड़ रहे परिवारों के लिए बजट में बड़ी राहत दी गई है:
कैंसर की दवाएं: कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली 17 दवाओं पर कस्टम ड्यूटी (आयात शुल्क) खत्म कर दी गई है।
दुर्लभ बीमारियां: हीमोफीलिया और सिकल सेल जैसी 7 दुर्लभ बीमारियों की दवाएं भी अब ड्यूटी फ्री होंगी।
आयुर्वेदिक AIIMS: देश में 3 नए आयुर्वेदिक एम्स खोले जाएंगे। साथ ही 5 मेडिकल हब बनाने की घोषणा की गई है।
3. कनेक्टिविटी: हाई-स्पीड रेल के 7 नए गलियारे
रेलवे और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बजट में भारी निवेश किया गया है:
7 हाई-स्पीड कॉरिडोर: मुंबई-पुणे, दिल्ली-वाराणसी, हैदराबाद-बेंगलुरु और चेन्नई-बेंगलुरु समेत 7 नए हाई-स्पीड रेल रूट बनेंगे।
टियर-2 और 3 शहर: छोटे शहरों के विकास के लिए ₹12.2 लाख करोड़ का भारी-भरकम बजट आवंटित किया गया है।
जलमार्ग: अगले 5 साल में 20 नए राष्ट्रीय जलमार्ग बनेंगे, जिसमें वाराणसी और पटना में जहाज मरम्मत की सुविधा मिलेगी।
4. शिक्षा और महिला विकास: 800 जिलों में गर्ल्स हॉस्टल
गर्ल्स एजुकेशन: देश के लगभग हर जिले (800 जिलों) में लड़कियों के लिए हॉस्टल बनाए जाएंगे।
कंटेंट क्रिएटर लैब्स: युवाओं के लिए 15,000 स्कूलों और 500 कॉलेजों में नई कंटेंट क्रिएटर लैब्स बनाई जाएंगी।
SHE-मार्ट: ‘लखपति दीदी’ की तर्ज पर महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों के लिए ‘शी-मार्ट’ दुकानें खुलेंगी, जिससे वे अपने उत्पाद सीधे बेच सकेंगी।
5. रक्षा बजट: आधुनिकीकरण पर ₹2.19 लाख करोड़
देश की सुरक्षा के लिए रक्षा बजट को 16% बढ़ाकर ₹7.85 लाख करोड़ कर दिया गया है।
इसमें से ₹2.19 लाख करोड़ केवल हथियारों और सैन्य बलों के आधुनिकीकरण (Modernization) पर खर्च होंगे।
नौसेना के बेड़े के लिए ₹25,000 करोड़ का विशेष प्रावधान है।
6. ग्रीन एनर्जी: इलेक्ट्रिक गाड़ियां होंगी सस्ती
लिथियम बैटरी: बैटरी बनाने वाली मशीनों पर टैक्स छूट बढ़ाई गई है, जिससे Electric Vehicles (EV) सस्ते हो सकते हैं।
सोलर पावर: सोलर ग्लास बनाने वाले कच्चे माल पर ड्यूटी हटा दी गई है, जिससे देश में सोलर पैनल बनाना सस्ता होगा।
इस बजट की 5 सबसे बड़ी ‘खामियां’ (जो आम आदमी को खलेंगी):
टैक्स में कोई राहत नहीं: उम्मीद थी कि 13 लाख तक की आय टैक्स फ्री होगी, लेकिन स्लैब में ₹1 का भी बदलाव नहीं हुआ।
महंगाई पर चुप्पी: पेट्रोल-डीजल की कीमतों या रसोई गैस पर कोई सीधी राहत नहीं दी गई।
रोजगार का स्पष्ट रोडमैप गायब: 500 कॉलेजों में ‘कंटेंट क्रिएटर लैब’ जैसी छोटी योजनाओं के अलावा बड़े स्तर पर बेरोजगारी दूर करने का कोई ठोस ऐलान नहीं दिखा।
किसान निधि पर सस्पेंस: उम्मीद थी कि ‘पीएम किसान निधि’ ₹6000 से बढ़कर ₹9000 होगी, लेकिन इस पर कोई घोषणा नहीं की गई।
पुराने निवेशों पर ध्यान नहीं: 80C जैसी पुरानी टैक्स रिजीम की बचत सीमाओं को नहीं बढ़ाया गया, जिससे पुराने टैक्सपेयर्स निराश हैं।
बजट की 5 ‘खूबियां’ (जहां सरकार ने बाजी मारी):
कैंसर का इलाज सस्ता: 17 इंपोर्टेड कैंसर दवाओं पर कस्टम ड्यूटी (5%) खत्म कर दी गई है। यह लाखों परिवारों के लिए जीवनदान जैसा है।
बुलेट ट्रेन की रफ्तार: 7 नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर (जैसे मुंबई-पुणे, दिल्ली-वाराणसी) से सफर की तस्वीर बदल जाएगी।
शिक्षा में निवेश: हर जिले में गर्ल्स हॉस्टल और 500 कॉलेजों में डिजिटल लैब युवाओं को नए जमाने के कौशल से जोड़ेगी।
डिफेंस में ‘आत्मनिर्भरता’: ₹7.85 लाख करोड़ के रक्षा बजट में से ₹2.19 लाख करोड़ सिर्फ आधुनिकीकरण पर खर्च होंगे।
इलेक्ट्रिक गाड़ियां सस्ती: लिथियम बैटरी पर टैक्स छूट से देश में इलेक्ट्रिक कार और स्कूटर के दाम कम होने की संभावना है।
क्या सस्ता हुआ और क्या महंगा?
| क्या सस्ता हुआ (Cheaper) | क्या महंगा हुआ (Dearer) |
| कैंसर की 17 इंपोर्टेड दवाएं | विदेशी कपड़े और जूते |
| इलेक्ट्रिक गाड़ियां (EV) | प्रीमियम मोबाइल पार्ट्स (कुछ विशेष) |
| सोलर पैनल और सोलर ग्लास | विदेश से मंगाई जाने वाली लग्जरी वस्तुएं |
| हवाई जहाज के पार्ट्स (इंपोर्ट) |
सच का समय – विशेष इस बजट को ‘विकसित भारत’ की ओर एक कदम माना जा रहा है। हालांकि मध्यम वर्ग को टैक्स स्लैब में राहत न मिलना निराश कर सकता है, लेकिन हेल्थ और इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस भविष्य के लिए सकारात्मक है।
UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की 'ब्रेक': केंद्र को झटका, कहा- प्रावधान स्पष्ट नहीं, दुरुपयोग का डर; 19 मार्च तक रोक

देशभर में भारी विरोध और कानूनी चुनौतियों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के विवादित नए नियमों (Equity Regulations, 2026) पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कड़े शब्दों में कहा कि इन नियमों के प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की 4 तीखी टिप्पणियां: “भगवान के लिए ऐसा मत कीजिए”
सुनवाई के दौरान CJI ने केंद्र सरकार और UGC से कई गंभीर सवाल पूछे:
अलग हॉस्टल पर आपत्ति: CJI ने अलग-अलग जातियों के लिए अलग हॉस्टल बनाने के प्रस्ताव पर नाराजगी जताते हुए कहा, “भगवान के लिए ऐसा मत कीजिए। हम एक जातिविहीन समाज की ओर बढ़ रहे हैं, क्या अब हम फिर से पीछे जाना चाहते हैं?”
भेदभाव की परिभाषा: कोर्ट ने पूछा कि जब ‘भेदभाव’ की सामान्य परिभाषा पहले से मौजूद है, तो केवल ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को ही अलग से परिभाषित क्यों किया गया?
रैगिंग पर चुप्पी: कोर्ट ने सवाल उठाया कि कैंपस की सबसे बड़ी समस्या ‘रैगिंग’ को इन नियमों में शामिल क्यों नहीं किया गया?
संपन्न वर्ग का सवाल: CJI ने कहा कि आरक्षित समुदायों में भी अब कई लोग आर्थिक रूप से समृद्ध हो चुके हैं, ऐसे में क्या ये नियम केवल एकतरफा नहीं हैं?
विवाद की जड़: क्यों हो रहा है ‘काले कानून’ के रूप में विरोध?
UGC द्वारा 13 जनवरी को जारी ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशन्स 2026’ में तीन ऐसे बदलाव किए गए जिनसे सवर्ण और जनरल कैटेगरी के छात्र भड़क उठे:
झूठी शिकायत पर सजा खत्म: पहले ड्राफ्ट में प्रावधान था कि अगर कोई छात्र गलत मंशा से शिकायत करता है तो उसे सजा मिलेगी, लेकिन फाइनल नियमों में यह हटा दिया गया।
जनरल कैटेगरी का प्रतिनिधित्व नहीं: शिकायतों की जांच करने वाली ‘इक्विटी कमेटी’ में जनरल कैटेगरी का सदस्य होना अनिवार्य नहीं रखा गया।
एकतरफा परिभाषा: विरोध करने वालों का आरोप है कि नियमों में जनरल कैटेगरी के छात्रों को ‘स्वाभाविक अपराधी’ (Natural Offenders) मान लिया गया है।
जश्न और प्रदर्शन: राज्यों का हाल
सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली:
यूपी (वाराणसी/बरेली): सवर्ण समाज के छात्रों ने रंग-गुलाल उड़ाकर जश्न मनाया। वहीं भीम आर्मी ने नियमों पर रोक का विरोध किया।
बिहार (पटना): राजपूत करणी सेना ने ‘काला कानून वापस लो’ के पोस्टरों के साथ प्रदर्शन किया।
हरियाणा: मशहूर गायक मासूम शर्मा और खिलाड़ी योगेश्वर दत्त ने भी सोशल मीडिया पर #UGCRollback कैंपेन का समर्थन किया।
मध्य प्रदेश: कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने सफाई दी कि उनकी समिति ने ‘झूठी शिकायत पर सजा’ हटाने की सिफारिश नहीं की थी, यह UGC का अपना फैसला था।
अब आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही नियमों का नया ड्राफ्ट तैयार करने का निर्देश दिया है। 19 मार्च 2026 को अगली सुनवाई होने तक देशभर के विश्वविद्यालयों में 2012 के पुराने नियम ही प्रभावी रहेंगे।
सच का समय – विश्लेषण: यह मामला अब केवल छात्रों का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय बनाम समानता के अधिकार की कानूनी जंग बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट का दखल यह सुनिश्चित करेगा कि भविष्य का ड्राफ्ट अधिक समावेशी और संतुलित हो।
महाराष्ट्र में शोक की लहर: प्लेन क्रैश में डिप्टी CM अजित पवार का निधन, बारामती में लैंडिंग के दौरान हुआ हादसा

महाराष्ट्र की राजनीति के कद्दावर नेता और उपमुख्यमंत्री अजित पवार का बुधवार सुबह एक दर्दनाक विमान हादसे में निधन हो गया। 66 वर्षीय पवार अपने चार्टर्ड प्लेन से बारामती जा रहे थे, जहाँ लैंडिंग के दौरान विमान क्रैश होकर आग का गोला बन गया। इस हादसे में अजित पवार समेत विमान में सवार सभी 5 लोगों की मौत हो गई। 
कैसे हुआ हादसा?
सुबह 8:10 बजे: अजित पवार ने मुंबई से बारामती के लिए उड़ान भरी थी। वे वहां जिला परिषद चुनावों के लिए रैलियों को संबोधित करने वाले थे।
लैंडिंग की कोशिश: केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री के अनुसार, पायलट ने बारामती एयरपोर्ट पर लैंडिंग की कोशिश की, लेकिन खराब विजिबिलिटी के कारण विमान को दोबारा ऊंचाई पर ले जाना पड़ा।
भीषण टक्कर: दूसरी कोशिश के दौरान विमान रनवे से पहले ही गिर गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, विमान जमीन से टकराते ही धमाकों के साथ जलने लगा। पायलट की ओर से कोई ‘मेडे’ (इमरजेंसी) कॉल भी नहीं दिया गया था।
हादसे में जान गंवाने वाले अन्य लोग
विमान में सवार 5 लोगों में कोई भी जीवित नहीं बचा:
अजित पवार (उपमुख्यमंत्री, महाराष्ट्र)
विदीप जाधव (सुरक्षाकर्मी/PSO)
पिंकी माली (कैबिन क्रू)
कैप्टन सुमित कपूर (पायलट-इन-कमांड)
कैप्टन शांभवी पाठक (को-पायलट)
राज्य में 3 दिन का शोक और राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार
देवेंद्र फडणवीस का ऐलान: मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राज्य में 3 दिन के राजकीय शोक की घोषणा की है। आज पूरे राज्य के स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में छुट्टी दी गई है।
अंतिम विदाई: अजित पवार का अंतिम संस्कार कल (गुरुवार) सुबह 11 बजे बारामती में पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के भी बारामती पहुंचने की संभावना है।
जाँच के घेरे में ‘VSR वेंचर्स’
एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) ने मामले की जांच शुरू कर दी है। ऑपरेटर कंपनी VSR वेंचर्स के दिल्ली स्थित ऑफिस पर भी टीम पहुंची है। हालांकि, कंपनी ने दावा किया है कि विमान में कोई तकनीकी खराबी नहीं थी और पायलट काफी अनुभवी थे।
सच का समय – विशेष श्रद्धांजलि: अजित पवार, जिन्हें महाराष्ट्र की राजनीति में ‘दादा’ के नाम से जाना जाता था, अपने कड़े फैसलों और विकास कार्यों के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। उनका जाना महाराष्ट्र के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
3 इडियट्स वाले सोनम वांगचुक: जेल में 'इनोवेशन' और 'पॉजिटिविटी'

जोधपुर सेंट्रल जेल में करीब 4 महीनों (120 दिनों से अधिक) से बंद सोनम वांगचुक की स्थिति को लेकर उनकी पत्नी गीतांजलि अंग्मो ने हाल ही में कई खुलासे किए हैं:
बैरक को ठंडा रखने का प्रयोग: यह सच है कि वांगचुक जेल की मुश्किल परिस्थितियों में भी अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को नहीं छोड़े हैं। उन्होंने जेल प्रशासन और कोर्ट से थर्मामीटर जैसे उपकरणों की मांग की है ताकि वे जेल के बैरक के तापमान का अध्ययन कर सकें और उसे गर्मियों में ठंडा व सर्दियों में गर्म रखने के लिए ‘पैसिव इंसुलेशन’ जैसे प्रयोग कर सकें।
किताबें और चींटियाँ: वे अपना अधिकांश समय पढ़ने और ध्यान (Vipassana) में बिता रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपनी पत्नी से ‘Ants: Workers of the World’ जैसी किताबें मंगवाई हैं। वे एकांत कारावास (Solitary Confinement) में चींटियों के व्यवहार और उनकी एकता का बारीकी से अवलोकन कर रहे हैं।
जेल स्टाफ को टिप्स: गीतांजलि के अनुसार, जेल का स्टाफ उनसे बच्चों की शिक्षा और बेहतर पेरेंटिंग को लेकर सलाह लेता है। वांगचुक उन्हें ‘रट्टा मार’ पढ़ाई के बजाय व्यावहारिक शिक्षा के महत्व को समझाते हैं।
लिख रहे हैं किताब: जेल के अपने अनुभवों पर वे एक किताब भी लिख रहे हैं, जिसका संभावित शीर्षक “Forever Positive” हो सकता है।
गिरफ्तारी का सच: क्यों हैं जोधपुर जेल में?
सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी और उन्हें राजस्थान शिफ्ट करने के पीछे के मुख्य कारण ये हैं:
NSA के तहत कार्रवाई: उन्हें 26 सितंबर 2025 को लद्दाख से गिरफ्तार किया गया था। उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाया गया है।
लेह हिंसा का आरोप: सरकार और लद्दाख प्रशासन का आरोप है कि वांगचुक के भाषणों (जिसमें उन्होंने ‘अरब स्प्रिंग’ और नेपाल के प्रदर्शनों का जिक्र किया था) की वजह से लेह में हिंसा भड़की। 24 सितंबर 2025 को हुई उस हिंसा में 4 लोगों की जान गई थी और कई घायल हुए थे।
लद्दाख की मांगें: वे लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची (6th Schedule) में शामिल करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर थे। सरकार का मानना है कि उनकी गतिविधियों से सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) को खतरा था, इसलिए उन्हें लद्दाख से दूर जोधपुर जेल भेजा गया।
कानूनी स्थिति
उनकी पत्नी ने उनकी रिहाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका (Habeas Corpus) दायर की है।
कोर्ट में सरकार का पक्ष है कि उनकी रिहाई से लद्दाख में फिर से शांति भंग हो सकती है, जबकि वांगचुक के वकीलों का कहना है कि यह ‘राजनीतिक बदले’ की कार्रवाई है।
एक खास बात: जेल में उन्हें बाहरी दुनिया से पूरी तरह काट दिया गया है। उनकी पत्नी के अनुसार, उन्हें अखबार भी दिए जाते हैं तो लद्दाख या उनसे जुड़ी खबरों वाले हिस्से काट दिए जाते हैं।
1. विवाद की शुरुआत: 2019 के बाद का लद्दाख
अगस्त 2019 में जब अनुच्छेद 370 हटा और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों (UT) में बांटा गया, तो लद्दाख के लोगों ने पहले इसका स्वागत किया। उन्हें लगा कि अब लेह को अलग पहचान मिलेगी। लेकिन जल्द ही उनकी खुशी चिंता में बदल गई क्योंकि:
नौकरियों का डर: स्थानीय लोगों को लगा कि बाहर के लोग आकर उनकी नौकरियां ले लेंगे।
जमीन और संस्कृति: लद्दाख के संवेदनशील पर्यावरण और आदिवासी संस्कृति को बाहरी हस्तक्षेप से खतरा महसूस होने लगा।
2. वांगचुक की मांगें (4-Point Agenda)
सोनम वांगचुक ने ‘लद्दाख एपेक्स बॉडी’ (LAB) और ‘कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस’ (KDA) के साथ मिलकर सरकार के सामने 4 मुख्य मांगें रखीं:
छठी अनुसूची (6th Schedule): इसके तहत लद्दाख को स्वायत्त परिषद बनाने का अधिकार मिले ताकि वे अपनी जमीन और संसाधनों की रक्षा खुद कर सकें।
पूर्ण राज्य का दर्जा: वे चाहते हैं कि लद्दाख केवल एक UT न रहे, बल्कि उसे पूर्ण राज्य बनाया जाए।
संसदीय सीटें: लद्दाख के लिए लोक सभा की दो सीटों की मांग।
नौकरी में आरक्षण: स्थानीय युवाओं के लिए भर्ती प्रक्रिया में प्राथमिकता।
3. गिरफ्तारी और जेल तक का सफर (Timeline)
यह मामला तब गंभीर हुआ जब वांगचुक ने “चलो लेह” मार्च और भूख हड़ताल (Fast unto death) शुरू की।
दिल्ली मार्च: वांगचुक ने लेह से दिल्ली तक पैदल यात्रा निकाली थी। उन्हें दिल्ली की सीमा (सिंघु बॉर्डर) पर हिरासत में लिया गया, जिससे काफी हंगामा हुआ।
लेह में हिंसा (सितंबर 2025): सरकार का दावा है कि 24 सितंबर 2025 को लेह में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़की, जिसमें कुछ लोगों की मौत हुई। प्रशासन ने इसका जिम्मेदार वांगचुक के बयानों को माना।
NSA और जोधपुर शिफ्टिंग: उन पर NSA (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) लगाया गया। सुरक्षा कारणों और लद्दाख में माहौल शांत रखने का हवाला देते हुए उन्हें लद्दाख से हजारों किलोमीटर दूर जोधपुर सेंट्रल जेल शिफ्ट कर दिया गया।
वर्तमान स्थिति: जेल के अंदर का सच
सोनम वांगचुक फिलहाल जोधपुर जेल में एक “सत्याग्रही” की तरह रह रहे हैं।
सच्चाई यह है कि वे वहां कोई अपराधी की तरह नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक की तरह समय बिता रहे हैं।
वे जेल के बैरकों में तापमान नियंत्रण (Temperature Control) के प्रयोग कर रहे हैं ताकि कैदियों को झुलसा देने वाली गर्मी से राहत मिल सके।
उनकी पत्नी गीतांजलि के अनुसार, प्रशासन ने उन्हें कुछ वैज्ञानिक उपकरण भी दिए हैं, जिनका उपयोग वे वहां की दीवारों और छतों के इंसुलेशन को समझने में कर रहे हैं।
निष्कर्ष
सरकार उन्हें “सुरक्षा के लिए खतरा” मानती है, जबकि उनके समर्थक उन्हें “लद्दाख का गांधी” कहते हैं जो हिमालय को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में है, जहां उनकी रिहाई और लद्दाख के अधिकारों पर बहस चल रही है।
सिस्टम की भेंट चढ़ते 'लोकतंत्र के सिपाही':
वोटर लिस्ट सुधार के दबाव में BLO ने तोड़ा दम, परिवारों में मातम

एक तरफ सुप्रीम कोर्ट में वोटर लिस्ट की शुद्धता पर जंग छिड़ी है, तो दूसरी तरफ ज़मीनी स्तर पर इसे लागू करने वाले BLO (Booth Level Officers) मौत के साये में काम करने को मजबूर हैं। चुनाव आयोग के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के भारी काम और अधिकारियों के दबाव ने अब मासूम कर्मचारियों की जान लेना शुरू कर दिया है।
काम का बोझ या ‘डेथ वारंट’?
खबरों के मुताबिक, पिछले कुछ हफ्तों में कई राज्यों से ड्यूटी के दौरान BLO की मौत की दुखद खबरें सामने आई हैं। ये वे लोग हैं (ज़्यादातर प्राइमरी टीचर या आंगनबाड़ी कार्यकर्ता), जिन्हें अपनी नियमित ड्यूटी के बाद घर-घर जाकर हज़ारों वोटर्स के दस्तावेज जाँचने का काम सौंपा गया है।
मौत की वजह बने ये 3 बड़े कारण:
असंभव डेडलाइन: लाखों नाम जाँचने के लिए चुनाव आयोग ने बहुत ही कम समय दिया, जिससे कर्मचारी दिन-रात काम करने को मजबूर हुए।
अधिकारियों की धमकी: रिपोर्ट में देरी होने पर BLO को सस्पेंशन (निलंबन) और सैलरी रोकने की धमकियां दी जा रही हैं।
मानसिक तनाव: जनता के गुस्से और ऊपर से अधिकारियों के दबाव के बीच पिस रहे इन कर्मचारियों को दिल का दौरा (Heart Attack) और ब्रेन हैमरेज जैसी गंभीर समस्याएं हो रही हैं।
शिक्षक संगठनों का फूटा गुस्सा
शिक्षक संगठनों का कहना है कि “हम शिक्षक हैं, कोई मशीन नहीं।” उनका आरोप है कि चुनाव आयोग एक तरफ 1.25 करोड़ लोगों की लिस्ट सुधारने की बात कर रहा है, लेकिन उन हाथों की सुध नहीं ले रहा जो ये काम कर रहे हैं। कई घरों के चिराग इस चुनावी ड्यूटी की वजह से बुझ गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का असर
अब जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि “कोई भी शक्ति अनियंत्रित नहीं हो सकती”, तो इसमें उन कर्मचारियों का दर्द भी शामिल है जो इस अनियंत्रित दबाव में अपनी जान गंवा रहे हैं। कोर्ट ने साफ संकेत दिए हैं कि नियम इंसानों के लिए होने चाहिए, न कि इंसान नियमों की बलि चढ़ जाए
चाबहार पोर्ट का 'सच':
क्या वाकई भारत के 1100 करोड़ डूब गए या यह कूटनीति की चाल है?
चाबहार पोर्ट को लेकर छिड़ी बहस के बीच की सच्चाई को हम 3 बड़े पहलुओं से समझ सकते हैं:
1. क्या भारत ने कंट्रोल छोड़ दिया है? (सच्चाई: ‘हाँ’ भी और ‘ना’ भी)
सच्चाई यह है कि भारत ने आधिकारिक तौर पर पोर्ट नहीं छोड़ा है, लेकिन काम की रफ्तार बेहद धीमी हो गई है।
भारत और ईरान के बीच 2018 में जो 10 साल का लॉन्ग-टर्म समझौता होना था, वह अमेरिका के प्रतिबंधों के डर से बार-बार टलता रहा। वर्तमान में भारत वहां केवल ‘शॉर्ट-टर्म’ (अल्पकालिक) समझौतों के आधार पर काम कर रहा है, जो हर कुछ महीनों में रिन्यू करने पड़ते हैं। इससे निवेश की सुरक्षा पर सवाल उठना लाजिमी है।
2. ट्रम्प फैक्टर और अमेरिकी दबाव का सच
डोनाल्ड ट्रम्प की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति का उद्देश्य ईरान की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करना है। अमेरिका चाहता है कि कोई भी देश ईरान के साथ बड़े प्रोजेक्ट न करे।
सच यह है कि भारत को चाबहार के लिए जो ‘छूट’ (Waiver) मिली है, वह सिर्फ इसलिए है क्योंकि यह अफगानिस्तान को मानवीय मदद भेजने का रास्ता है। अगर कल को अमेरिका यह छूट खत्म कर देता है, तो भारत की कोई भी कंपनी (जैसे टाटा या अडानी) वहां निवेश नहीं करेगी क्योंकि उन पर भी अमेरिकी प्रतिबंध लग सकते हैं। यही वो दबाव है जिसका जिक्र विपक्ष कर रहा है।
3. 1100 करोड़ रुपये का सच
भारत ने अब तक वहां इंफ्रास्ट्रक्चर और क्रेन जैसी मशीनों पर करोड़ों खर्च किए हैं। लेकिन सच यह है कि इस पोर्ट का इस्तेमाल उस लेवल पर नहीं हो पाया जितना सोचा गया था।
चीन का ग्वादर पोर्ट (पाकिस्तान में) बहुत तेजी से विकसित हुआ है, जबकि चाबहार राजनीतिक अनिश्चितता की भेंट चढ़ गया है। अगर वहां व्यापार नहीं बढ़ता, तो निवेश किया गया पैसा ‘डेड इन्वेस्टमेंट’ (मृत निवेश) बन सकता है।
सच का समय न्यूज़ का निष्कर्ष
सच्चाई यह है कि भारत एक बहुत ही मुश्किल स्थिति में फंसा है:
अगर भारत चाबहार छोड़ता है, तो चीन तुरंत वहां कब्जा कर लेगा (जैसा उसने श्रीलंका के हंबनटोटा में किया)।
अगर भारत वहां तेजी से काम करता है, तो अमेरिका (ट्रम्प) भारत पर भारी व्यापारिक प्रतिबंध या टैरिफ लगा सकता है।
निष्कर्ष: सरकार का ‘इनकार’ अपनी जगह सही है कि प्रोजेक्ट बंद नहीं हुआ है, लेकिन कांग्रेस का ‘आरोप’ भी पूरी तरह गलत नहीं है कि अमेरिकी दबाव में प्रोजेक्ट की हालत पतली है। भारत फिलहाल “देखो और इंतजार करो” की नीति अपना रहा है, ताकि ट्रम्प प्रशासन के साथ कोई बीच का रास्ता निकल सके।
आज का कड़वा सच: अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ‘दोस्ती’ से बड़े ‘हित’ होते हैं। भारत के लिए चाबहार को बचाए रखना अब एक आर्थिक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक बड़ी कूटनीतिक परीक्षा बन गया है।
